लाइफस्टाइल

सच्चाई की रोशनी: परिवार की आत्ममंथन

कल फोन आया था कि रश्मि एक बजे ट्रेन से आ रही है। घर में हलचल मच गई। सभी उसकी अगवानी की तैयारियों में जुट गए थे। रश्मि की ससुराल से यह दूसरी बार घर आना था, और इस बार वह अपने पति के साथ आ रही थी। घर में उत्साह का माहौल था, हर कोई अपने तरीके से तैयारियों में लगा हुआ था।
तभी अचानक, एक तेज आवाज गूंजी, “इतना सब देने की क्या जरूरत है? बेकार की फिजूलखर्ची क्यों कर रहे हो? और हाँ, आ रही है तो टैक्सी कर के आ जाए स्टेशन से।” यह आवाज अजय की थी, जो बहन के आने की खबर सुनकर भुनभुना रहा था।
माँ की आंखों में एक पल के लिए सवालिया निशान उभर आया। “जब घर में दो-दो गाड़ियाँ हैं, तो मेरी बेटी टैक्सी से क्यों आएगी? और दामाद जी का कोई मान-सम्मान नहीं है क्या?” माँ ने हल्के से फटकारते हुए कहा।
पिता ने स्थिति को भांपते हुए तुरंत प्रतिक्रिया दी, “ससुराल में उसे कुछ सुनना न पड़े, मैं खुद जाऊंगा उसे लेने। तुम्हें अगर कोई तकलीफ है, तो तुम मत जाना।” पिता के शब्दों में नाराजगी और संजीदगी का मिश्रण था।
लेकिन अजय ने हार मानने का नाम नहीं लिया। उसने तंज कसते हुए कहा, “और ये इतना सारा सामान का खर्चा क्यों? शादी में दे दिया, अब और पैसा फूँकने से क्या मतलब?”
पिता का गुस्सा अब उबाल पर था। “बकवास बंद कर। ये मेरा पैसा है, मैं अपनी बेटी को चाहे जो दूँ। तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या जो ऐसी बातें कर रहे हो?” उन्होंने कड़क आवाज में जवाब दिया।
अजय ने दबे स्वर में फिर कहा, “चाहे जब चली आती है मुँह उठाये।”
यह सुनकर पिता अब अपने गुस्से को काबू में नहीं रख पाए। चिल्लाते हुए बोले, “क्यों नहीं आएगी? ये उसका भी घर है। जब चाहे, जितने दिन चाहे, वह रह सकती है। बराबरी का हक है उसका। आखिर तुम्हें हो क्या गया है जो ऐसी बातें कर रहे हो?”
अजय ने अपने पिता की ओर देखते हुए जवाब दिया, “मुझे कुछ नहीं हुआ है पिताजी। आज मैं वही बोल रहा हूँ जो आप हमेशा बुआ के लिए बोलते थे। आज अपनी बेटी के लिए आपको बड़ा दर्द हो रहा है, लेकिन कभी दादाजी के दर्द के बारे में सोचा है? कभी बुआ की ससुराल और फूफाजी के मान-सम्मान की बात नहीं सोची?”
माँ और पिता जी अचानक खामोश हो गए, उनके चेहरे पर गहरी चुप्पी थी। लेकिन अजय का गुस्सा अब तक थमा नहीं था। उसने कहा, “दादाजी ने कभी आपसे एक पैसा नहीं मांगा, वो खुद आपसे ज्यादा सक्षम थे, फिर भी आपको बुआ का आना और दादाजी का उन्हें कुछ देना नहीं सुहाया… क्यों? और अगर हक की बात करें तो आपकी बेटी से भी पहले बुआ का हक है इस घर पर।”
अजय की आवाज भर्रा गई थी, और अफसोस भरे स्वर में वह बोलता गया। पिता की गर्दन शर्म से झुक गई, लेकिन अजय रुका नहीं। “आपके खुदगर्ज स्वभाव के कारण बुआ ने यहाँ आना ही छोड़ दिया। दादाजी इसी गम में घुलकर चले गए। और हाँ, मैं खुद जा रहा हूँ स्टेशन रश्मि को लेने, पर मुझे इस बात की खुशी है कि मैं कम से कम आपके जैसा खुदगर्ज भाई नहीं हूँ।”
कहते हुए अजय कार की चाबी उठाकर स्टेशन के लिए निकल गया। पिता की आँखों में आंसू आ गए, और वह अपनी बहन सरिता को फोन लगाने लगे। दीवार पर लगी दादाजी की तस्वीर जैसे मुस्कुरा रही थी, मानो कह रही हो कि आखिरकार, सच सामने आ ही गया।

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