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अमृता और इमरोज़: सच्चे प्रेम की कहानी

प्रेम में डूबी हर स्त्री कहीं न कहीं खुद को अमृता के रूप में देखती है या फिर अमृता बनने की चाह रखती है, लेकिन उनके हिस्से में हमेशा एक इमरोज़ नहीं होता। शायद इसलिए कि इमरोज़ होना एक पुरुष के लिए हमारी सामाजिक संरचना में बेहद चुनौतीपूर्ण होता है—खासकर उस स्त्री से प्रेम करना और जीवनभर उस प्रेम में बंधकर रहना, जब यह स्पष्ट हो कि वह स्त्री पूरी तरह उसकी नहीं है।
अमृता प्रीतम और इमरोज़ की प्रेम कहानी अद्वितीय थी। अमृता ने एक बार इमरोज़ से कहा था, “तुम मुझे जिंदगी की शाम में क्यों मिले, मिलना था तो दोपहर में मिलते।” यह कहकर उन्होंने इमरोज़ को अपनी व्यथा सुनाई थी, एक ऐसी व्यथा जो किसी भी स्त्री की हो सकती है जो अपने जीवन के उत्तरार्ध में किसी अद्वितीय प्रेम का साक्षात्कार करती है।
जब अमृता और इमरोज़ ने एक साथ रहने का फैसला किया, तो अमृता ने इमरोज़ से कहा, “एक बार तुम पूरी दुनिया घूम आओ, फिर भी अगर तुम मुझे चुनोगे, तो मुझे कोई उज्र नहीं होगा। मैं तुम्हें यहीं इंतजार करती मिलूंगी।” इसके जवाब में, इमरोज़ ने उस कमरे के सात चक्कर लगाए और बोले, “हो गया, अब तो…।” उनके लिए अमृता का साथ ही पूरी दुनिया थी, और उस दुनिया से बाहर कुछ भी नहीं था।
उनके प्रेम की गहराई और समझदारी को देखिए कि सालों तक एक ही घर में साथ रहने के बावजूद दोनों अलग-अलग कमरों में रहते थे। इमरोज़ बताते हैं कि अमृता को रात में लिखने की आदत थी, क्योंकि उस समय कोई आवाज़ नहीं होती थी, न कोई फोन बजता था और न ही कोई आता-जाता था। अमृता लिखने में तल्लीन रहती थीं, और उन्हें चाय की जरूरत होती थी। इमरोज़ ने यह जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। वे रात में 1 बजे उठते, चुपचाप चाय बनाते और उनके बगल में रख आते। अमृता इतनी खोई रहतीं कि इमरोज़ की ओर देखती भी नहीं थीं। यह सिलसिला चालीस-पचास सालों तक यूं ही चलता रहा।
एक और किस्सा बताते हुए इमरोज़ कहते हैं कि एक बार जब वे अमृता को अपनी स्कूटर पर बैठाकर कहीं जा रहे थे, तो पूरे रास्ते अमृता की उंगलियाँ उनकी पीठ पर कुछ लिख रही थीं। इमरोज़ जानते थे कि वे शब्द साहिर लुधियानवी का नाम थे। इमरोज़ को इससे कोई नाराजगी नहीं थी। उन्होंने कहा, “मैं भी अमृता का हूं, मेरी पीठ भी अमृता की है।”
इमरोज़ होना आसान नहीं है, और मैंने प्रेम में इमरोज़ होने का चुनाव किया।
अमृता की अंतिम नज़्म ‘मैं तुझे फिर मिलूंगी’ इमरोज़ के नाम थी, केवल और केवल इमरोज़ के लिए:
“मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ, कैसे, पता नहीं
शायद तेरे कल्पनाओं की प्रेरणा बन
तेरे केनवास पर उतरूँगी
या तेरे केनवास पर
एक रहस्यमयी लकीर बन
ख़ामोश तुझे देखती रहूँगी
मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ, कैसे, पता नहीं।”
अमृता और इमरोज़ की प्रेम कहानी एक ऐसी कहानी है जो हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम सीमाओं से परे होता है। यह प्रेम एक दूसरे को पूरी तरह स्वीकार करने, सम्मान देने और साथ निभाने का नाम है, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों।

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