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अम्मा किसके घर जाएगी? परिवार की जिम्मेदारी और बुढ़ापे की कड़वी सच्चाई

अम्मा किसके घर जाएगी? एक परिवार की विडंबनात्मक दास्तान

अम्मा किसके घर जाएगी? परिवार की चुनौतियाँ और बुढ़ापे की सच्चाई

अम्मा किसके घर जाएगी?
तीनों बेटों और बेटी के चेहरे पर एक ही सवाल था। वे सब एक घंटे से अस्पताल के बरामदे में टहलते हुए इस सवाल का जवाब सोच रहे थे।

“मेरा ख्याल है, राजेश भैया सबसे बड़े हैं, इसलिए उनका कर्तव्य है कि वे अम्मा को अपने घर ले जाएँ,” छोटी बहन नीलिमा ने बड़े भाई की ओर देखते हुए कहा।

बड़े भाई ने एक नज़र अपनी पत्नी की ओर देखा और कहा, “मुझे पता है कि यह मेरा कर्तव्य है कि मैं अम्मा को अपने घर ले जाऊं। लेकिन तुम जानते हो, मैं और मेरी पत्नी, हम दोनों जॉब करते हैं और अम्मा की देखभाल के लिए सारा दिन किसी न किसी को तो रहना ही होगा, जो हम नहीं कर सकते। लेकिन बहन, तुम तो सारा दिन अपने घर में ही रहती हो। मेरे करों जितने पैसे लगेंगे, मैं देने के लिए तैयार हूँ।”

राजेश ने पैसों पर जोर देते हुए नीलिमा से कहा, “भैया, मेरी तो बड़ी ख्वाहिश है कि मैं अम्मा का खूब ख्याल रखूं, उनकी सेवा करूं। लेकिन आप मेरे ससुराल वालों को तो जानते हो, ना? मुझसे यह बर्दाश्त नहीं होगा कि कोई मेरे भाइयों को बुरा भला कहे। मेरा ख्याल है, मनोज भैया के घर अम्मा ज्यादा आराम से रह सकती हैं।” छोटे भाई सुरेश ने भी बहन की हाँ में हाँ मिलाई।

मनोज और उसकी पत्नी ने एक दूसरे की तरफ देखा। ऐसा लग रहा था जैसे वे आँखों ही आँखों में एक-दूसरे से कुछ कह रहे हों। इसके बाद मनोज ने कहा, “तुम सब तो जानते हो, ना? हमारे घर में अम्मा का दिल नहीं लगता। वे तो हमारे घर दो दिन से ज्यादा रहती भी नहीं थीं।”

“तो क्या होगा? अम्मा को कौन रखेगा?” नीलिमा ने अपने छोटे भाई सुरेश की तरफ देखते हुए कहा।

“अरे, तुम सब मुझे तो देखो ही नहीं। मेरा तो घर भी बहुत छोटा है और वेतन भी बहुत कम है। मेरी तो मजबूरी है, मैं अम्मा को अपने साथ नहीं रख सकता,” सुरेश ने अपने हाथ खड़े कर दिए।

तो फिर अम्मा किसके घर जाएगी? सभी लोग इसी सोच में गुम थे।

“आई एम सॉरी, आपकी माता जी को नहीं बचा सके,” डॉक्टर ने राजेश के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।

सबके चेहरे पर उदासी तो थी, लेकिन शायद दिल के किसी कोने में खुशी भी थी कि अब उन्हें अपनी अम्मा की सेवा नहीं करनी पड़ेगी और न ही अम्मा को किसी के घर जाना पड़ेगा। यही हमारे समाज की कड़वी सच्चाई है कि अकेले माता-पिता 10 बच्चों को पाल सकते हैं, लेकिन 10 बच्चे मिलकर माता-पिता को संभाल नहीं सकते। और कई माताएँ अपने जीवन के अंतिम क्षणों में बुढ़ापे में सड़कों पर रोजी-रोटी कमाने में बिताती हैं। कृपया अपने माता-पिता से प्यार करें, जितना हो सके उनकी सेवा करें, ताकि आपके बच्चे भी आपके साथ ऐसा ही करें।

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