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लड़के मार डालते हैं अपनी मुलायमित को मर्द बनते ही!

ज़िम्मेदारियों का बोझ टाँगे हर दिन एक सफ़र पर निकलते हैं. इस सफ़र में उसे सफल होने की जल्दी रहती है. उसे पति-बाप-बेटा सब बनना होता है. वो बन भी जाते हैं मगर अंदर के अपने उस लड़के को मार कर.
जो शायद चित्रकार, क़िस्सागो, लेखक, नायक या फिर संगीतकार और गायक हो सकता था. मगर उसने चुना एक सफल पति या बाप होना.
उसने बड़ी बेरहमी से पहले उस लड़के को मारा फिर शेष बचे प्रेमी को.
वो सफल मर्द बन गया. लेकिन इन्हीं में से किसी सफ़र के दौरान कभी अंदर के चित्रकार को मेट्रो से उतरते वक़्त ढकेल दिया पटरियों पर और इल्ज़ाम भीड़ पर धर दिया.
किसी दिन बाथरूम में ऑफ़िस जाने की जल्दी में, गुनगुनाते हुए गला दबा दिया उस गीतकार का जो सिरज सकता था प्रेम के कई नए गीत.
कभी किसी दिन पुल के ऊपर से गुज़र रहे बस में से फेंक दिया बस्ता वो जिसमें कई कहानियाँ थीं. जो लिखा था कभी कॉलेज वाले अशोक के पेड़ के नीचे बैठ कर. उस लड़की की कल्पना में जो उसे किसी ऐड फ़िल्म के पोस्टर में दिखी थी
.
उस लड़की को देखते हुए उसने सोचा था कि एक दिन उसकी प्रेमिका जो होगी तो ऐसी ही होगी. और उसे तब सुनाएगा वो ये कहानी.
लेकिन वो बजाय बनने के प्रेमी उसे समाज ने पति बना दिया. पति ऐसा जिसे निभाने थे सारे फ़र्ज़. पति के बाद बाप. जिसे कमाना था सिर्फ़ रोटी ही नहीं बल्कि पिज़्ज़ा, वीकेंड पर मूवी के लिए पैसा, गजरे के बदले साग-सब्ज़ी और हफ़्ते भर की ग्रोस्री. स्कूल का फ़ी, जूते और कराटे क्लास का फ़ी भरने के लिए पैसा और ख़ूब पैसा.
वो कमाता गया. साथ अर्ज़ता गया शोहरत भी मगर अपने अंदर के उस लड़के को मार वो अब खोखला हो चुका है. वो बस मर्द है. मुलायमियत बाक़ी नहीं रही उसमें कोई.
उसे अब पसीजना नहीं आता. उसे रोना भी नहीं आता. वो अब स्ट्रॉंग पापा और पर्फ़ेक्ट पति बन चुका है.
… लेकिन एक मुर्दा लड़का उसके अंदर कहीं अभी भी एकाध साँस में धड़क लेता है!
~अज्ञात

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