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रघुवीर ने दहेज के पैसे लौटाकर समाज को दिखाया सच्चा सम्मान

रघुवीर के बेटे शिवपाल की तीसरी सगाई की बात चल रही थी। पहले दो बार सगाई टूट जाने की वजह से इस बार शिवपाल और उसके परिवार वाले खासे सतर्क थे। पहले की गलतियों से सीख लेते हुए इस बार हर कदम सोच-समझकर उठाया जा रहा था।
रघुवीर ने अपने पुराने अनुभवों को ध्यान में रखते हुए इस बार कुछ शर्तें रखने का फैसला किया। “लड़का पढ़ा-लिखा है, और सरकारी नौकरी में है। हमारा परिवार भी प्रतिष्ठित है। इसलिए दहेज तो लेना ही होगा। हमारे पास टी.वी., फ्रिज़, ए.सी., कार सब कुछ है, इसलिए इस बार हमें दहेज में सिर्फ नकद रकम चाहिए,” रघुवीर ने अपने पारिवारिक स्तर और स्टेटस के हिसाब से दहेज की माँग साफ-साफ रख दी।
लड़की वालों ने स्थिति को तौलते हुए सोचा, “शिवपाल पढ़ा-लिखा है, अच्छी नौकरी करता है और उसका परिवार भी सम्मानित है। अगर कुछ नकद दे दिया जाए तो इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। लड़का अच्छा है, तो यह एक बार का खर्चा कोई बुरी बात नहीं।”
काफी विचार-विमर्श के बाद दोनों परिवार इस नतीजे पर पहुँचे कि दहेज के रूप में पाँच लाख रुपये नकद दिए जाएँगे। इस समझौते से दोनों परिवार संतुष्ट थे और शादी की तारीख तय हो गई।
नियत दिन पर, रघुवीर अपनी बारात लेकर लड़की वालों के घर पहुँच गया। शादी की सारी तैयारियाँ हो चुकी थीं। पंडित जी ने सभी को जल्दी-जल्दी फेरे की तैयारी करने को कहा, “लग्न का समय बीत रहा है, जल्दी फेरे शुरू करो।”
लेकिन रघुवीर ने तुरंत बीच में टोका, “पहले दहेज की रकम लाओ, उसके बाद ही फेरे होंगे।”
लड़की के पिता ने घबराते हुए रुपयों से भरा बैग रघुवीर के हाथों में थमा दिया। रघुवीर ने बैग पकड़ते ही फेरे शुरू करने की अनुमति दे दी और शादी की सभी रस्में खुशी-खुशी पूरी की गईं। बारातियों की खूब खातिरदारी की गई और सभी हंसी-खुशी माहौल में शादी के बाद विदाई की तैयारी होने लगी।
जब डोली की विदाई का वक्त आया, रघुवीर ने अचानक रुपयों से भरा बैग लड़की के पिता की ओर बढ़ा दिया। लड़की के पिता ने हैरान होकर रघुवीर के चेहरे की ओर देखा। उसे लगा कि अब रघुवीर कोई और माँग रखने जा रहा है। इस बात से वह घबरा भी गया कि कहीं अब कोई और शर्त सामने न आ जाए।
रघुवीर ने लड़की के पिता की उलझन भांपते हुए कहा, “आप परेशान मत होइए। मैं आपको बस यह बताना चाहता हूँ कि यह पैसा मैं लौटा रहा हूँ।”
लड़की का पिता आश्चर्यचकित होकर बोला, “लेकिन आपने तो खुद दहेज माँगा था। अब क्यों इसे लौटा रहे हैं?”
रघुवीर ने एक गहरी सांस लेते हुए कहा, “आप सही कह रहे हैं। दरअसल, मेरे बेटे की पहले दो बार सगाई टूट चुकी थी। इसका मुख्य कारण यह था कि मैं दहेज के खिलाफ था और बिना दहेज शादी करना चाहता था। लेकिन जब हमने दहेज की माँग नहीं की, तो लोगों को यह शक हो गया कि शायद लड़के में कोई कमी है, इसलिए हम दहेज नहीं ले रहे। इससे हमारी दोनों सगाई टूट गई।”
उसने आगे कहा, “मैं यह तीसरी बार नहीं चाहता था कि फिर से वही गलती हो और सगाई टूट जाए। इसलिए मुझे मजबूरी में दहेज की माँग करनी पड़ी। लेकिन अब, जब शादी हो चुकी है और दोनों परिवार इस बंधन से खुश हैं, तो मुझे इस दहेज की कोई जरूरत नहीं। इसलिए मैं इसे लौटा रहा हूँ।”
यह सुनकर लड़की का पिता और वहां मौजूद सभी लोग भावुक हो गए। रघुवीर का यह कदम सबके लिए चौंकाने वाला था, लेकिन साथ ही सभी ने उसकी ईमानदारी की सराहना की। उसने दिखा दिया कि समाज में फैली दहेज प्रथा के खिलाफ खड़ा होना मुश्किल जरूर है, लेकिन अगर सही इरादे हों तो इसे बदला भी जा सकता है।
इस तरह, रघुवीर ने न सिर्फ अपने बेटे की शादी को सफल बनाया, बल्कि समाज में एक मिसाल कायम की कि दहेज लेना-देना केवल एक दिखावा है, असली मूल्य रिश्तों और भावनाओं का होता है।

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