जीवन की जड़ों से जुड़ना: खुशियों की खोज

एक दरख्त भी जीने की ललक नही छोड़ाता टहनियाँ सूख जाती है तना सूख जाता है । दीमक खोखला कर देती है । मगर पेड़ की जड़े दूसरी जगह जीवन के कपोल उगा देती है । उसकी जड़ो मे जीवन जीने की अभी लालसा है उमंग है । वह मरना नही चाहती । वह जीवन के कपोल फिर उगा देना चाहती है ।
मगर एक पेड़ से कही ज्यादा बुद्धिमान विकसित इंसान को जीवन एक थकाऊ और बोझ लगता है उसके अन्दर जीवन की लालसा उमंग उत्साह को बदलते सामाजिक परिवेश ने खा लिया है । उसके लिए जीवन जीने का विषय नही बल्कि एक बोझ है जो वह काट रहा है । एक समय है जिसे वह गुजार रहा है । इसी प्रवृत्ति के कारण वह चिड़चिड़ा हो गया है हर वक्त तनाव और एक अवसाद लिए घूमता है । असहनशील इतना हो गया है कि छोटी छोटी बातो पर बड़े बड़े झगड़े करता घूमता है । काम से लेकर घर तक की उसकी सारी जीवनशैली उसके जीवन को मारने पर अतुर है । हँसना तो जैसे वह भूल ही गया है ।
इस बदलती जीवनशैली ने सिर्फ जवान इंसानो को ही अपना शिकार नही बनाया बल्कि मासूम बच्चो को भी उम्र से पहले बूढ़ा बना दिया है सरकार के एक आकड़े के मुताबिक 2017 से 2019 तक 24000 बच्चो ने आत्महत्या कर ली थी ! आखिर इतना तनाव इतना अवसाद उन्हे दिया किस समाज ने ?
जवान आदमी और बच्चो की बाजाय आपको आज भी बुजुर्ग लोग जिंदादिल मिलेगां जिनके अन्दर जीने की लालसा है उमंग है उत्साह है । जो कहते है कि आदमी मन से बूढ़ा होता है । अगर मन बूढ़ा हो गया तो तन भी साथ छोड़ देगा । बीमारियाँ तन को खोखला कर सकती है मगर मन के अन्दर जीवन के कपोल फूटते रहने चाहिए। जो तुम्हे बच्चा बनाये रक्खे । तुम्हारे अन्दर ललक और उल्लास बनाये रक्खे ।
जिए जी भर के __ खुशी हो ग़म मस्त रहो हर दम





