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सच्ची देखभाल की सीख: राधिका की वापसी और सूरज का एहसास

पिछले साल की बात है, जब सूरज अपने परिवार को छोड़ने रेलवे स्टेशन गया। उसकी पत्नी, राधिका, और दोनों बच्चे 15 दिन के लिए मायके जा रहे थे। स्टेशन पर राधिका ने सख्त हिदायत दी, “माँ-पापा का ध्यान रखना, समय-समय पर उन्हें दवाई और खाना खाने को कहिएगा।
सूरज ने बड़े ही आत्मविश्वास से कहा, “हाँ-हाँ, तुम चिंता मत करो। जाओ, आराम से रहो। 15 दिन क्या, एक महीने भी लगाओ, माँ-पापा और मैं मज़े से रहेंगे। आखिर मैं भी उनका बेटा हूँ!
राधिका मुस्कुराते हुए ट्रेन में बैठ गई, और ट्रेन धीरे-धीरे चल पड़ी। सूरज ने सोचा कि कुछ तला-भुना लेकर माँ-पापा के लिए नाश्ता ले जाऊं, जिससे माँ को खाना बनाने की ज़रूरत न पड़े। सुबह के 8:10 बज रहे थे, जब वह घर पहुंचा।
माँ ने नाश्ते में कचोरी-समोसा देखकर कहा तुझे नहीं पता क्या. हमने तला-भुना खाना पिछले आठ महीनों से बंद कर दिया है।
सूरज के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आई, लेकिन माँ की बात ने उसे सोच में डाल दिया। उसने मन में सोचा तुम्हें कैसे पता चलेगा सूरज? तुम घर में होते ही कितने हो।
आखिरकार दोनों ने दूध-ब्रेड का नाश्ता किया। नाश्ते के बाद सूरज ने दवाइयों का डिब्बा माँ के सामने रखा और दवाई लेने को कहा। माँ ने जवाब दिया, “हमें क्या पता कौन सी दवा लेनी है, रोज़ तो राधिका ही निकालकर देती है।
सूरज ने राधिका को फोन लगाया और दवाइयों के बारे में पूछा। उसने दवाइयाँ निकालकर माँ-पापा को दीं, लेकिन यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ। राधिका के जाने के बाद सूरज को अनगिनत बार फोन लगाना पड़ा—कौन सी चीज़ कहाँ रखी है, माँ-पापा को क्या पसंद है, और कौन सी दवा कब देनी है।
माँ-पापा का चेहरा मुरझाया हुआ लग रहा था, जैसे उनके बुढ़ापे की लाठी कहीं खो गई हो। उनका झुंझलाना और चिढ़ना बढ़ता जा रहा था। सूरज को उनके अकेलेपन का अहसास होने लगा, और उसने खुद को बेबस महसूस किया।
सूरज ने आखिरकार अपनी सारी अकड़ और “मैं भी उनका बेटा हूँ” वाली सोच को छोड़कर एक सप्ताह बाद ही राधिका को फोन करके वापस बुला लिया।
जब राधिका और बच्चे घर लौटे, तो माँ-पापा के चेहरे पर जो मुस्कान और खुशी आई, वह देखने लायक थी। जैसे पतझड़ के बाद सूख चुके पेड़ की शाखाओं पर हरी पत्तियाँ खिल आई हों।
और क्यों न हो, उनके परिवार की देखभाल करने वाली राधिका जो वापस आ गई थी।
सूरज को भी इन दिनों में एक बात अच्छी तरह समझ आ गई थी कि बुढ़ापे में माँ-पापा के लिए असली सहारा एक समझदार और प्यार करने वाली बहू ही होती है, ना कि केवल बेटा।



